​जशपुर/फरसाबहार :- शिक्षा विभाग में नियमों के दोहरे मापदंड का एक हैरान कर देने वाला मामला सामने आया है। एक ओर जहां कोई शिक्षक स्कूल पहुंचने में मात्र 15 मिनट की देरी कर दे, तो विकासखंड शिक्षा अधिकारी (BEO) तत्काल जिला शिक्षा अधिकारी (DEO) को प्रतिवेदन भेजकर उसे निलंबित करवा देते हैं। वहीं दूसरी ओर, जब इन्हीं अधिकारियों पर लाखों रुपये की अवैध वसूली और प्रताड़ना के गंभीर आरोप लगते हैं, तो पूरा प्रशासनिक अमला रहस्यमयी चुप्पी साध लेता है।इन पर कार्यवाही करने से क्यों अधिकारियों के हाथ कांपते है.हैरान करने वाली बात तो यह है कि सूबे के मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय जी के विधानसभा में अफसरशाही की लाबी इतनी मजबूत है कि कार्यवाही के लिये अफसर गंभीर नहीं.इसके क्या मायने हो सकते है।

​मामला जशपुर जिले के फरसाबहार विकासखंड का है। छ.ग. सहायक शिक्षक/समग्र शिक्षक फेडरेशन ने सीधे जिला कलेक्टर और मुख्यमंत्री के नाम ‘सीएम कैम्प कार्यालय, बगिया’ में एक कड़ा शिकायती पत्र सौंपा है। इसमें बीइओ, एबीईओ और बीआरसीसी पर भ्रष्टाचार, पद के दुरुपयोग और शिक्षकों सहित महिला शिक्षिकाओं को मानसिक व आर्थिक शोषण के गंभीर आरोप लगाए गए हैं।

कलेक्टर और सीएम कैम्प तक पहुंची शिकायत, फिर भी कार्रवाई का इंतजार क्यों?

​इस पूरे प्रकरण में सबसे बड़ा और गंभीर सवाल प्रशासनिक कार्यप्रणाली पर उठ रहा है। शिक्षकों से कथित अवैध वसूली के संबंध में जब लिखित शिकायतें दी गई हों, पीड़ित शिक्षकों के लिखित बयान उपलब्ध हों और मामला सीधे जिले के मुखिया (कलेक्टर) तथा माननीय मुख्यमंत्री के विधानसभा क्षेत्र स्थित ‘सीएम कैंप कार्यालय, बगिया’ तक पहुंच चुका हो, तो आज तक जांच दल का गठन क्यों नहीं हुआ?
​कलेक्टर कार्यालय और मुख्यमंत्री कैंप जैसे सर्वोच्च और संवेदनशील स्थानों पर शिकायत दिए जाने के बावजूद यदि कार्रवाई की फाइल आगे नहीं बढ़ती, तो यह एक बड़ा संदेह पैदा करता है। आखिर किसके राजनीतिक या प्रशासनिक संरक्षण में बीइओ, एबीईओ और बीआरसीसी के विरुद्ध लगाए गए गंभीर आरोपों की जांच लंबित रखी गई है?

यूं चलता है वसूली का ‘सिस्टम’?

​इस पूरे मामले की तह तक जाने के लिए जब हमने फेडरेशन के विकासखंड अध्यक्ष नरेश कुमार यादव से चर्चा की, तो कथित वसूली के ‘सिस्टम’ की कई चौंकाने वाली बातें सामने आईं। फेडरेशन के ब्लॉक इकाई के ​अध्यक्ष नरेश कुमार यादव ने बताया कि अधिकारियों द्वारा स्कूलों का औचक निरीक्षण किया जाता है। वहां जानबूझकर कोई छोटी-मोटी कमी निकालकर शिक्षकों को पहले स्पष्टीकरण थमाया जाता है। इसके बाद उन्हें कार्यालय बुलाकर निलंबन और विभागीय कार्रवाई का खौफ दिखाया जाता है। इसी डर का फायदा उठाकर शिक्षकों से ₹20,000 से लेकर ₹50,000 और कुछ मामलों में ₹1,00,000 तक की अवैध वसूली की जाती है। अब तक लगभग 8 शिक्षकों ने संगठन के सामने लिखित में अपनी आपबीती दर्ज कराई है।

ज्ञापन में लगाए गए प्रमुख और गंभीर आरोप?

​अधिकारियों द्वारा निरीक्षण, निलंबन, प्रतिकूल प्रतिवेदन और स्थानांतरण का भय दिखाकर शिक्षकों से अनुचित आर्थिक लाभ की मांग की जा रही है।

​शासकीय कार्यों की एवज में घूस!
शासकीय कार्यों को प्रभावित करने, निलंबन समाप्त कराने और PFMS भुगतान के नाम पर पैसों की खुली मांग की गई।

​इसके साथ ही हैरान करने वाली बात है कि शिक्षा विभाग के अधिकारी महिला शिक्षकों को भी देर रात तक कार्यालय में बैठाकर मानसिक रूप से प्रताड़ित किए जाने का उल्लेख शिकायत में है।

​इसके साथ ही फेडरेशन ने आरोप लगाया है कि जो शिक्षक इस कथित भ्रष्टाचार की शिकायत करने या विरोध करने का प्रयास करते हैं, उन्हें निलंबन और दंडात्मक कार्रवाई की धमकी दी जाती है।

मामले को लेकर ​फेडरेशन का स्पष्ट कहना है कि वे किसी भी अधिकारी को स्वयं दोषी घोषित नहीं कर रहे हैं। उनकी मांग सिर्फ इतनी है कि इन आरोपों की एक स्वतंत्र और निष्पक्ष जांच कराई जाए:

​पूरे मामले की राज्य स्तरीय स्वतंत्र और निष्पक्ष समिति से समयबद्ध जांच कराई जाए।

इसके साथ ही फेडरेशन ने​निष्पक्ष जांच के लिए जांच अवधि तक संबंधित अधिकारियों बीइओ, एबीईओ और बीआरसीसी को प्रशासनिक कार्यों से तुरंत पृथक किये जाने की मांग की है।उन्होंने ​आर्थिक अनियमितताओं की जांच एंटी करप्शन ब्यूरो (ACB) या अन्य सक्षम संस्था से कराई जाने व ​आरोप सही पाए जाने पर जिम्मेदार लोगों पर नियमानुसार कठोर कानूनी कार्रवाई हो और यदि शिकायतें गलत हैं तो स्थिति स्पष्ट की मांग के साथ ​शिक्षकों के लिए एक नियम और अधिकारियों के लिए दूसरा नियम—यह दोहरा मापदंड कतई स्वीकार नहीं किया जाने की बात कही है।

फेडरेशन ने कहा कि शिक्षा व्यवस्था की रीढ़ शिक्षक हैं, लेकिन जब रक्षक ही भक्षक बन जाएं, तो यह व्यवस्था के लिए एक बड़ा कलंक है। अब देखना यह है कि सीएम कैंप और कलेक्टर कार्यालय की चौखट तक मामला पहुँचे लगभग 10 दिन बीत गये है.लेकिन अब तक कोई कार्यवाही का संकेत नहीं मिला है. अब देखना होगा कि शासन-प्रशासन इस पर क्या सख्त कदम उठाता है।

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