
जशपुर/नई दिल्ली :-25 जुलाई 2026 देशभर के छात्र-छात्राओं के मौलिक अधिकारों, उनके उज्ज्वल भविष्य और देश की शिक्षा व्यवस्था में जवाबदेही के गंभीर सवालों को लेकर चल रहे देशव्यापी छात्र आंदोलन ने अब राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली का रुख कर लिया है। इसी कड़ी में छत्तीसगढ़ के दूरस्थ आदिवासी बाहुल्य जिले जशपुर से जिला पंचायत सदस्य आशिका कुजूर सीधे नई दिल्ली के जंतर-मंतर पहुँचीं। उन्होंने वहाँ चल रहे छात्रों के इस ऐतिहासिक आंदोलन में सक्रिय रूप से शामिल होकर न केवल अपनी मुखर उपस्थिति दर्ज कराई, बल्कि छात्रों की जायज़ मांगों के प्रति पूर्ण एकजुटता और समर्थन का ऐलान भी किया।
जशपुर से हज़ारों किलोमीटर दूर दिल्ली पहुँचकर आशिका कुजूर ने साबित कर दिया कि जनप्रतिनिधियों की सरोकारिता केवल स्थानीय सीमाओं तक सीमित नहीं होती, बल्कि राष्ट्र के युवाओं का भविष्य हर जागरूक नागरिक और जनप्रतिनिधि की प्राथमिकता होना चाहिए। इस दौरान उनके हाथ में शहीद भगत सिंह का चित्र इस बात का प्रतीक था कि युवाओं का यह संघर्ष देश की वैचारिक और क्रांतिकारी परंपरा को आगे बढ़ा रहा है।
आशिका कुजूर ने आंदोलन स्थल पर मीडिया और छात्रों से संवाद करते हुए स्पष्ट किया कि छात्रों के भविष्य से जुड़े सवाल किसी एक शहर, राज्य या खास भौगोलिक क्षेत्र तक सीमित नहीं हैं। यह सीधे तौर पर देश की आने वाली पीढ़ी के सुनहरे भविष्य और राष्ट्र निर्माण का सवाल है।
उन्होंने अपनी बात को विस्तार देते हुए कहा,
“जशपुर जैसे दूरस्थ आदिवासी और ग्रामीण क्षेत्र के हजारों छात्र-छात्राएँ अपनी समस्याओं और अधिकारों की आवाज़ लेकर हर बार दिल्ली जैसे महानगरों तक नहीं पहुँच सकते। उनके लिए संसाधनों और दूरियों की अपनी सीमाएँ हैं। ऐसे में उनके एक जनप्रतिनिधि और बड़े भाई-बहन के रूप में यह मेरा नैतिक कर्तव्य बनता है कि मैं दिल्ली पहुँचकर उनकी इस सुप्त और प्रखर आवाज़ को राष्ट्रीय स्तर तक पहुँचाऊँ।”
आलोचकों को कड़ा जवाब देते हुए उन्होंने दो टूक कहा कि एक जनप्रतिनिधि की जिम्मेदारी केवल अपने वार्ड या पंचायत की सीमाओं तक ही सीमित नहीं होती। जब देश के युवाओं के भविष्य पर गंभीर संकट खड़े हों, जब देश का छात्र अपनी न्यायसंगत माँगों के लिए सड़कों पर उतरने को विवश हो जाए, तब एक जनप्रतिनिधि के रूप में चुप्पी साधना जनविश्वास के साथ सबसे बड़ा छल है।
आज ही केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे के घटनाक्रम पर प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए आशिका कुजूर ने इसे देशभर के छात्रों द्वारा की गई लंबी मेहनत, संयम और लोकतांत्रिक संघर्ष की एक बड़ी नैतिक जीत करार दिया।
उन्होंने कहा कि आज देश के युवाओं और छात्रों की आवाज़ पहले से कहीं अधिक सशक्त होकर उभरी है। इस ऐतिहासिक घटना ने सत्ता के गलियारों में यह स्पष्ट संदेश दे दिया है कि देश का युवा वर्ग अपने भविष्य और अकादमिक गरिमा के साथ किसी भी प्रकार का समझौता स्वीकार करने को तैयार नहीं है। जब छात्र एकजुट होकर लोकतांत्रिक दायरे में रहकर अपने अधिकारों के लिए आवाज बुलंद करते हैं, तो अंततः सत्ता को भी झुकना पड़ता है और उनकी बात सुननी ही पड़ती है।
उन्होंने कहा कि यह लड़ाई किसी एक मंत्री के इस्तीफे के साथ खत्म नहीं होती। यह शिक्षा व्यवस्था में पारदर्शिता और जवाबदेही की लंबी लड़ाई का सिर्फ एक पड़ाव है।
उन्होंने यह भी जोड़ा कि धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा केवल एक व्यक्ति के पद से हटने भर की घटना नहीं है, बल्कि यह सरकार की प्रशासनिक जवाबदेही का मूल सवाल है। देश के छात्रों को एक ऐसी पारदर्शी और जवाबदेह शिक्षा व्यवस्था की दरकार है, जहाँ प्रतियोगी परीक्षाओं में पूरी पारदर्शिता हो, दिन-रात मेहनत करने वाले परिश्रमी युवाओं के साथ न्याय हो और उनके भविष्य के साथ कोई खिलवाड़ न किया जा सके।
अपने संबोधन के अंत में आशिका कुजूर ने बेहद भावुक और वैचारिक पक्ष रखते हुए कहा कि आज का यह संघर्ष केवल वर्तमान समय के छात्रों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह हमारी आने वाली पीढ़ियों के सुरक्षित और उज्ज्वल कल के लिए है।
उन्होंने कहा कल जब आने वाली पीढ़ी हमसे यह सवाल पूछेगी कि जब उनके बेहतर भविष्य के लिए देश भर में ऐतिहासिक लड़ाइयाँ लड़ी जा रही थीं, तब आप कहाँ थे? तब हमारे पास यह कहने का साहस होना चाहिए कि हम घरों में बैठकर तमाशा नहीं देख रहे थे, बल्कि हम उस संघर्ष में उनके पाले में मजबूती से खड़े थे।”
उन्होंने दोहराया कि जंतर-मंतर पहुँचना किसी प्रकार का राजनीतिक दिखावा या स्टंट नहीं है, बल्कि एक जिम्मेदार नागरिक और जनप्रतिनिधि के रूप में छात्रों के भविष्य के प्रति अपनी प्रतिबद्धता निभाने का दृढ़ संकल्प है। राजनीति उनके लिए केवल चुनाव जीतने या सत्ता हासिल करने का माध्यम भर नहीं है, बल्कि जनमुद्दों के साथ खड़े होने और अन्याय के खिलाफ मुखर होने का पवित्र मार्ग है।
